हजारों रोगों की एक दवा, संयम का पालन करो – जैन मुनि प्रबुद्ध सागर जी

नरसिंहपुर गोटेगांव/ मुकेश राय

व्यक्ति के पास हजारों रोग हैं तो सम्यक दृष्टिवान के पास हजारों रोगों की एक ही दवा है वह है संयम का पालन करना। धर्म शास्त्र, आरोग्य शास्त्र से भी बड़ा है इससे धर्म भी हो जाता है और रोग भी खत्म हो जाते हैं।
यह धर्ममय जीवनोपयोगी बात गोटेगांव नगर में विराजमान मुनि श्री 108 प्रबुद्ध सागर जी महाराज ने अपने धर्म प्रवचनों में कहीं ।
नगर की श्री 1008 शांतिनाथ उच्च न्यायालय के आचार्य विद्यासागर सभागार में विराजमान मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति को सदैव अपने जीवन में नियम, संयम का पालन करना चाहिए। उसे धर्म ध्यान करना चाहिए यदि वह ऐसा कर सका तो उसका जीवन व्यर्थ नहीं जा सकता।
आज भुखमरी से मरने वालों की संख्या कम है और जरूरत से ज्यादा भोजन खाने वालों की संख्या ज्यादा है। भोजन कम करना स्वस्थ शरीर की पहचान है और ज्यादा भोजन करना रोगी शरीर की पहचान है।
सभी को मालूम है कि यह शरीर रोगों का घर है। इसके बावजूद भी इंसान शरीर से मोह रखता है। जबकि उसे शरीर से मोह नहीं रखना चाहिए। इंसान का शरीर से मोह त्यागना ही श्रेयस्कर मार्ग है।
मुनि श्री ने कहा कि वही व्यक्ति शीर्ष पुरुष हो सकता है जो 46 गुणों से युक्त हों और 18 दोषों से रहित हो। जिसमें भी यह श्रेष्ठ गुण होंगे वहीं शीर्ष पुरुष सच्चा देव कहलाता है ।
देवत्व के लिए आवश्यक है कि वेदना का प्रतिकार नहीं करना है ,बल्कि उसे सहन करना है । लंबे समय तक जिसने क्षुधा रोग को सहन कर लिया उन्हें क्षुधा की वेदना के लिए भोजन की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। हालांकि बाहरी आवरण देखा जाए तो वेदना असहनीय होती है लेकिन अंतश की दृष्टि से देखते हैं तो यह वेदना सहनीय हो जाती है।
मुनि श्री ने आज के समय में लोगों की व्यवहारिक वास्तविकता की सच्चाई बतलाते हुए कहा कि कुछ लोगों को लटकना और भटकना अच्छा लगता है ।लेकिन सम्यक दृष्टि के धारक को लटकना भटकना अच्छा नहीं लगता ।उसकी दृष्टि बाहर काम और अंतश की ओर ज्यादा रहती है। जिनेंद्र प्रभु की दृष्टि सदैव नासा पर होती है ।इसलिए उनकी दृष्टि सम्यक दृष्टि है। दोष रहित दृष्टि है और इसलिए उन्हें भूख, प्यास ,वेदना से भी कोई फर्क नहीं पड़ता। भगवान की कभी भी दृष्टि पराई वस्तु पर नहीं रहती।
मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति के बुढ़ापे में इंद्रियां तो शिथिल रहती है, काया बूढी रहती है, लेकिन तृष्णा जबान होती है, जबकि होना यह चाहिए कि तृष्णा भी बूढ़ी होकर होना ही नहीं चाहिए ।
व्यक्तियों की यह सोच गलत है, यह मूर्खता वाली बात है।

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